Anusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi)
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Anusandhan: A Multidisciplinary International Journal (Hindi)Advanced Research Publicationsen-USAnusanadhan: A Multidisciplinary International Journal (In Hindi)2456-0510भारतीय ज्ञान परंपरा: स्मृति, अभ्यास और परंपरा के आलोक में एक जीवित ज्ञान प्रणाली का दार्शनिक अनुशीलन
https://www.thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/1980
<p>प्रस्तुत शोधपत्र का उद्देश्य भारतीय ज्ञान परंपरा को एक ऐतिहासिक अथवा ग्रंथपरक संरचना के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवित, गतिशील और अनुभवसिद्ध ज्ञान प्रणाली के रूप में प्रतिष्ठित करना है। अध्ययन में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की विशिष्टता उसके त्रिसूत्रात्मक स्वरूप—स्मृति , अभ्यास और परंपरा—में निहित है। स्मृति ज्ञान का संरक्षण करती है, अभ्यास उसे जीवन में उतारता है और परंपरा उसे कालातीत प्रवाह प्रदान करती है। उपनिषद, भगवद्गीता, योग-परंपरा तथा शास्त्रीय दार्शनिक ग्रंथों के आलोक में यह शोध स्पष्ट करता है कि भारतीय दृष्टि में ज्ञान का लक्ष्य केवल बौद्धिक बोध नहीं, बल्कि चेतना का रूपांतरण, नैतिक उत्कर्ष और सामाजिक संतुलन है। समकालीन शिक्षा, तकनीक, मानसिक संकट और वैश्विक विमर्श के संदर्भ में भारतीय ज्ञान परंपरा की प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया गया है। निष्कर्षतः यह अध्ययन भारतीय ज्ञान परंपरा को एक ऐसी समन्वयात्मक और मानवीय ज्ञान-व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करता है, जो वर्तमान और भविष्य—दोनों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>ख़ालिद हसन अब्बासी, भारतीय ज्ञान परंपरा: स्मृति, अभ्यास और परंपरा के आलोक में एक जीवित ज्ञान प्रणाली का दार्शनिक अनुशीलन, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 1-12.</em></p> <p><strong>DOI:</strong>https://doi.org/10.24321/2456.0510.202603</p>ख़ालिद हसन अब्ब़ासी
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2026-03-142026-03-1411Special (Issue)112भारतीय मनीषा में चेतना के स्वरूप का एक समीक्षात्मक अध्ययन
https://www.thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/1982
<p>यदि हम भारतीय दर्शन की सूक्ष्म विवेचना करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि समस्त भारतीय ज्ञान दर्शन स्व के अन्वेषण और सत्य की खोज पर केन्द्रित है और अन्वेषण की यह यात्रा चेतना के इर्द गिर्द घूमती है। जहाँ एक ओर पाश्चात्य दर्शन चेतना तत्व को केवल मस्तिष्क का एक अवयव मानता है] वहीं दूसरी ओर भारतीय मनस्वियों ने चेतना की ब्राह्मण्ड के आदि तत्व और अटल सत्य के रूप में विवेचना की है। ऋग्वैदिक मनीषियों से लेकर वेदांत के दार्शनिकों तक] तथागत बुद्ध से लेकर अद्वैतवादी शंकराचार्य तक प्रत्येक ने अपने-अपने ज्ञान के आधार पर चेतना के मौलिक स्वरूप को जानने का प्रयत्न किया है। वेदांत दर्शन में चेतना को प्रज्ञान ब्रह् कहा गया है। जिसका तात्पर्य है कि इंसानरूपी चेतना ही ब्रह्म है। सांख्य दर्शन चेतना को प्रकृति से अलग पुरूष चेतन रूप में स्वीकार करता है जबकि अद्वैतवादी दर्शन चेतना के सत्] चित् एवं आनंद के समग्र रूप में सच्चिदानंद के रूप में स्वीकार करता है। प्रस्तुत शोध पत्र में हम चेतना स्वरूप को जानने हेतु भारतीय ज्ञान दर्शन की विभिन्न शाखाओं जैसे उपनिषद्] सांख्य] योग और बौद्ध दर्शन में चेतना से जुड़े विभिन्न आयामों मौलिक गुण धर्म तथा उसके व्यापक स्वरूप का विश्लेषण करेंगे।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>दीपक कुमार, विकास कुमार, भारतीय मनीषा में चेतना के स्वरूप का एक समीक्षात्मक अध्ययन, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 13-16.</em></p> <p><strong>DOI: </strong>https://doi.org/10.24321/2456.0510.202606</p>दीपक कुमारविकास कुमार
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2026-03-162026-03-1611Special (Issue)1316भारतीय ज्ञान प्रणाली का सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भूमिका: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
https://www.thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/2020
<p>भारतीय ज्ञान प्रणाली (IKS) भारत की वैदिक, दार्शनिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं का समेकित स्वरूप है, जो मानव, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन की भावना पर आधारित है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिपादित सतत विकास लक्ष्य (SDGs) मानवता के समग्र और समावेशी विकास का आधुनिक वैश्विक एजेंडा प्रस्तुत करते हैं। प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय ज्ञान प्रणाली के मूल सिद्धांतों जैसे सर्वभूत हिताय, वसुधैव कुटुम्बकम्, यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे और ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के माध्यम से सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में उसकी प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>जगदीश, भारतीय ज्ञान प्रणाली का सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भूमिका: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 17-21.</em></p> <p><em><strong>DOI: </strong></em>https://doi.org/10.24321/2456.0510.202609</p>जगदीश
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2026-03-282026-03-2811Special (Issue)1721भारतीय पर्यावरण चिंतन एवं सतत् विकास की अवधारणा
https://www.thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/2044
<p> प्रस्तुत शोध पत्र में भारतीय पर्यावरण चिंतन एवं सतत विकास की अवधारणा विषय पर प्रकाश डाला गया है, भारतीय परिपेक्ष में पर्यावरण के सभी अवयवों को जैविक शक्ति का दर्जा दिया गया है। हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रकृति पूजा का विधान दिया गया है जो या दर्शाता है कि हमारे भारतीय मनीषी पर्यावरण के प्रति कितने संवेदनशील थे, तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने कितने महत्वपूर्ण कार्य संपन्न किए। वर्तमान में सतत विकास शब्द अत्यधिक प्रचलन में है परंतु इसकी जड़े हमें प्राचीन काल से ही दिखाई देती है, हमारे शास्त्रों में प्रारंभ से ही यह बताया गया है कि प्रकृति द्वारा दी गई प्रत्येक वस्तु अथवा संसाधन का प्रयोग इस प्रकार किया जाए जिससे वह पूर्णतया नष्ट ना हो तथा वर्तमान पीढ़ियों की आवश्यकता को पूर्ण करते हुए भविष्य में आने वाली पीढियों के लिए भी सुरक्षित रह सके। सामान्य शब्दों में कहा जाए तो सतत विकास को संधारणीय विकास, टिकाऊ या स्थाई विकास आदि नामों से जाना जाता है। जिससे तात्पर्य है कि प्रकृति से हमें जो कुछ भी प्राप्त होता है उसको इस प्रकार से प्रयोग में लाया जा सके कि भविष्य की पीढ़ी को समझौता न करना पड़े।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>आंचल, भारतीय पर्यावरण चिंतन एवं सतत् विकास की अवधारणा, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 22-28</em></p> <p><strong>DOI:</strong> https://doi.org/10.24321/2456.0510.202610</p>आंचलअजय परमार
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2026-04-042026-04-0411Special (Issue)2228अनौपचारिक शिक्षा से औपचारिक शिक्षा की ओर: गुरुकुल से आधुनिक संस्थानों तक
https://www.thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/2046
<p>यदि हम भारतीय शिक्षा प्रणाली की बात करें, तो यह न केवल प्राचीन है अपितू निरतंर प्रवाहित होती रही है, इसके मूल में जहाँ हम गुरुकुल परंपरा को देखते हैं, वहीं, आधुनिक दौर में एक औपचारिक व् संस्थागत शिक्षा प्रणाली का विकास प्रतिलक्षित होता है । अतीत में, "गुरु-शिष्य परंपरा" का अनौपचारिक शिक्षा पर बहुत गहरा प्रभाव था। इस प्रकार की शिक्षा में, गुरु-गृह ही छात्रों का घर होता था, जहाँ वे पढाई, दैनिकजीवन तथा अध्ययन कार्य करते थे। इस शिक्षा का प्रारंभिक उद्देश्य मात्र छात्रों के बौद्धिक विकास तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्हें नैतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और व्यावहारिक जीवन कौशल विकसित करने में मदद करना भी था। प्राचीन काल में अनुभव आधारित शिक्षा का प्रचलन था जिसमें विद्यार्थी अभ्यास तथा दूसरों से प्रेरित होकर विषयवस्तु सीखते थे तथा उसी से जीवन कौशल उन्मुख शिक्षा का भी विकास संभव हुआ। जैसे-जैसे समय बीतता गया, शैक्षिक प्रणाली में बहुत बदलाव आया बाकी सामाजिक कानून-बाना अधिक कठोर हो चला, प्रौद्योगिकी तथा विज्ञान अपने चरमावस्था में जा पहुँचा। तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला और वल्लभी कुछ ऐसे शुरुआती शिक्षण संस्थान थे, जहाँ छात्रों को बेहद व्यवस्थित और क्रमबद्ध तरीके से शिक्षा दी जाती थी, अक्सर बौद्धिक चर्चाओं के माध्यम से। गणित का अध्ययन, इसे सीखना एवं समझना परिपक्वता की निशानी बनी। अतीत में मानव पारस्परिक चर्चा के माध्यम से गणित में रुचि लेते, इस गणित को प्रायः कृषि व्यापार तथा धार्मिक कार्यों में प्रयोक्त किया जाता परंतु समय बदला और आधुनिक दौर में गणितीय प्रयोग अधिक औपचारिक और विश्लेषणात्मक बन गया इस दौर में हमने सांकेतिक भाषा और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया। इस प्रकार, मैकाले की शिक्षा नीति ने औपनिवेशिक काल के दौरान भारत के स्कूलों के कामकाज के तरीके को बदल दिया, जिससे वे पाठ्यक्रम, परीक्षाओं और संस्थागत ढाँचों पर अधिक केंद्रित हो गए। भारत की स्वतंत्रता के बाद, जवाहरलाल नेहरू ने वैज्ञानिक और तकनीकी शिक्षा को अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध कराने के प्रयासों का नेतृत्व किया। इससे उच्च शिक्षा प्रणाली अधिक सुदृढ़ और उपयोगी बनी। यह शोध पत्र अनौपचारिक से औपचारिक शिक्षा की ओर हुए संक्रमण की पड़ताल करता है, और यह दर्शाता है कि शैक्षिक प्रतिमानों के विकास के बावजूद, 'गुरु-शिष्य' (शिक्षक-छात्र) संबंध का मूल सार भारतीय शैक्षिक प्रणाली की आधारशिला के रूप में आज भी कायम है।</p> <p>रजत कौशिक, सुशील कुर्मी, अमित महतो & सुधांशु अग्रवाल, अनौपचारिक शिक्षा से औपचारिक शिक्षा की ओर: गुरुकुल से आधुनिक संस्थानों तक, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 29-34</em></p> <p><em><strong>DOI: </strong></em><a href="https://doi.org/10.24321/2456.0510.202609">https://doi.org/</a>10.24321/2456.0510.202611</p>Rajat KaushikSusheel KurmiAmit MahatoSudhanshu Aggarwal
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2026-04-062026-04-0611Special (Issue)2934प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के गणितीय निष्कर्षों की आधुनिक प्रासंगिकता
https://www.thejournalshouse.com/index.php/Anusandhan-Hindi-IntlJournal/article/view/2063
<p>प्रस्तुत शोध में प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के गणितीय निष्कर्षों की आधुनिक प्रासंगिकता का अध्ययन किया गया है। विशेष रूप से आर्यभट्ट, भास्कराचार्य एवं अन्य गणितज्ञों के योगदानों का विश्लेषण करते हुए यह स्पष्ट किया गया है कि उनके सिद्धांत आज भी गणित, विज्ञान एवं तकनीकी क्षेत्रों में उपयोगी हैं। अध्ययन में द्वितीयक स्रोतों के आधार पर यह पाया गया कि प्राचीन भारतीय गणितीय विधियाँ सरल, तार्किक एवं व्यावहारिक थीं, जो आधुनिक गणितीय अवधारणाओं की नींव रखती हैं। साथ ही, इन सिद्धांतों को वर्तमान शिक्षा प्रणाली में शामिल करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है, जिससे विद्यार्थियों की समझ और रुचि में वृद्धि हो सके।</p> <p><strong>How to cite this article:</strong></p> <p>रजत कौशिक, ऋचा पाठक & सुधांशु अग्रवाल, प्राचीन भारतीय गणितज्ञों के गणितीय निष्कर्षों की आधुनिक प्रासंगिकता, Anu: a, Mul, Int, Jour, <em>Vol 11, 2026 (Special Issue): Pg. No. 35-43</em></p> <p><strong>DOI: </strong><a href="https://doi.org/10.24321/2456.0510.202609">https://doi.org/</a>10.24321/2456.0510.202613</p>Rajat KaushikRicha PathakSudhanshu Aggarwal
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2026-04-112026-04-1111Special (Issue)3543