फीजी में हिंदी के प्रयोग-वर्धन हेतु व्यावहारिक उपाय: शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य
Keywords:
फीजी, भाषा संरक्षण, भाषा नीति, प्रवासी चेतना, सांस्कृतिक पहचान, हिंदी शिक्षण, गिरमिटिया इतिहासAbstract
यह शोध आलेख फीजी में हिंदी भाषा के प्रयोग-वर्धन हेतु व्यावहारिक उपायों का विश्लेषण शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। फीजी में हिंदी केवल एक संप्रेषण माध्यम नहीं, बल्कि प्रवासी भारतीय समुदाय की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक निरंतरता का आधार रही है। गिरमिट काल से लेकर वर्तमान में हिंदी ने प्रवासी भारतीयों को एक सूत्र में बाँधने वाली संपर्क भाषा की भूमिका निभाई है। किंतु समकालीन समय में अंग्रेज़ी के वर्चस्व, शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन, वैश्वीकरण, डिजिटल संस्कृति तथा रोजगारोन्मुख दृष्टिकोण के कारण हिंदी के प्रयोग में निरंतर गिरावट देखी जा रही है। यह आलेख फीजी में हिंदी की भाषिक विविधता (फीजी हिंदी, मानक हिंदी और संस्कृतनिष्ठ हिंदी), संवैधानिक मान्यता, शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका, सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों के योगदान तथा धार्मिक परंपराओं के माध्यम से भाषा संरक्षण की प्रक्रिया का समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करता है। शोध में यह स्पष्ट किया गया है कि हिंदी केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना, सामुदायिक पहचान और सामाजिक मूल्यों की भाषा है। अतः हिंदी का संरक्षण और संवर्धन केवल भाषा नीति का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अस्तित्व, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रीय पहचान से जुड़ा व्यापक सरोकार है।
How to cite this article:
Kumar Sl & Chand SL, फीजी में हिंदी के प्रयोग-वर्धन हेतु व्यावहारिक उपाय: शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं नीतिगत परिप्रेक्ष्य, Anu: a, Mul, Int, Jour, 2026; 11(1&2): 49-53.
DOI: https://doi.org/10.24321/2456.0510.202607
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